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जशरंग महोत्सव: राजा रवि वर्मा के वैचारिक संघर्षों ने दर्शकों को झकझोरा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बिखेरी चमक


जशपुर। जशरंग राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के चौथे दिन कला और वैचारिक विमर्श का अनूठा संगम देखने को मिला। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत पी एम श्री केंद्रीय विद्यालय की छात्रा पारुल के राजस्थानी लोकनृत्य से हुई, जिसकी चपलता और लय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके पश्चात श्री महावीर दिगंबर जैन विद्यालय के छात्रों ने ‘वंदे मातरम’ पर भरतनाट्यम की गरिमामयी प्रस्तुति दी, जिसका कुशल निर्देशन छत्तीसगढ़िया क्लाउड की नृत्य प्रशिक्षक मनीषा भगत ने किया था।

वहीं, सरस्वती पाठक के निर्देशन में सरस्वती कथक केंद्र की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत समूह नृत्य ने शास्त्रीय सौंदर्य की छटा बिखेरी।
महोत्सव की मुख्य प्रस्तुति नाटक “रवि वर्मा: द अनटोल्ड बैटल” रही, जिसने भारतीय कला और सामाजिक रूढ़ियों के बीच के गहरे अंतर्द्वंद्व को मंच पर जीवंत कर दिया। प्रख्यात रंगकर्मी डॉ. आनंद कुमार पांडे के निर्देशन तथा रोहित श्रीवास्तव व आनंद पांडे के लेखन में तैयार इस नाटक ने महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के उस संघर्ष को उजागर किया, जहाँ उन्हें देवी-देवताओं को मानवीय स्वरूप देने के कारण समाज के भारी विरोध और न्यायलय की जटिलताओं का सामना करना पड़ा था।


अभिनय के मोर्चे पर रोहित श्रीवास्तव ने राजा रवि वर्मा की भूमिका में गहरा प्रभाव छोड़ा, जबकि अल्बर्ट श्रीवास्तव ने आयिलियम तिरुनाल के रूप में राजसी गरिमा को बखूबी निभाया। थावेंद्र रजक, आमोद श्रीवास्तव, अनमोल पमनानी, गजेंद्र साहू और चंद्र मोहन ने विभिन्न दोहरी भूमिकाओं के माध्यम से अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। सुगंधा के रूप में दिव्या राय के भावनात्मक अभिनय और आचार्य चिंतामणि के रूप में मनमोहन कास्दे के कड़क संवादों ने नाटक में गहराई पैदा की। तकनीकी पक्ष को स्वप्निल हुड्डर की प्रकाश व्यवस्था और विकास गायकवाड़ के संगीत ने सशक्त बनाया, जिससे अदालत के दृश्य और कलाकार का आंतरिक संघर्ष दर्शकों को भावुक कर गया।


समापन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की संरक्षिका कुंवररानी जया सिंह जुदेव उपस्थित रहीं, जिन्होंने कलाकारों की प्रशंसा करते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। इस दौरान शशि कुमार (IFS) को प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। यह नाटक न केवल एक कलाकार की जीवनी रहा, बल्कि कला की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की सीमाओं पर समाज के समक्ष एक गंभीर प्रश्न छोड़ गया।

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