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​छठ महापर्व 2025: 36 घंटे का निर्जला व्रत, नहाय खाय आज जानें विधि, धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व


✍️ By: रविन्द्र यादव | धर्म-संस्कृति डेस्क | Updated: October 2025


छठ पूजा 2025: आस्था, संयम और सूर्य उपासना का महापर्व

भारत के सबसे पवित्र पर्वों में से एक छठ पूजा इस वर्ष भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। यह पर्व सूर्य देव और उनकी बहन छठी मइया (उषा देवी) की उपासना को समर्पित है।
चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका गहरा वैज्ञानिक और सामाजिक संदेश भी है।

इस वर्ष छठ पूजा 2025 की शुरुआत 26 अक्टूबर (रविवार) से होगी और इसका समापन 29 अक्टूबर (बुधवार) को उषा अर्घ्य और व्रत पारण के साथ किया जाएगा।


छठ पूजा 2025: चार दिनों का पूरा कार्यक्रम

पहला दिन – नहाय-खाय (25 अक्टूबर 2025, शनिवार)

छठ पूजा की पावन शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर घर लाए जल से शुद्ध भोजन बनाते हैं।
भोजन में कद्दू-भात और चने की दाल का विशेष महत्व होता है। व्रती इस दिन एक ही बार भोजन करते हैं, जिससे उनके शरीर और मन की शुद्धि होती है।
➡️ यह दिन शुद्धता, संयम और भक्ति की नींव रखता है।


दूसरा दिन – खरना (26 अक्टूबर 2025, रविवार)

दूसरे दिन व्रती पूरे दिन निर्जला रहते हैं। सूर्यास्त के बाद पूजा के बाद गुड़ की खीर, रोटी और केला का प्रसाद तैयार किया जाता है।
पूजा के पश्चात व्रती यह प्रसाद ग्रहण करते हैं और इसके बाद शुरू होता है 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास।
➡️ खरना आत्मसंयम और तप का प्रतीक माना जाता है।


तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य (27 अक्टूबर 2025, सोमवार)

तीसरे दिन घाटों पर आस्था का सागर उमड़ पड़ता है। व्रती शाम के समय डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
बाँस की टोकरी में ठेकुआ, नारियल, केला, ईख, दीपक और फल लेकर सूर्य की उपासना की जाती है।
पूरे घाट पर पारंपरिक गीतों की गूंज, दीपों की रोशनी और आस्था का वातावरण हर किसी को भावविभोर कर देता है।
➡️ संध्या अर्घ्य जीवन में संतुलन और विनम्रता का संदेश देता है।


चौथा दिन – उषा अर्घ्य एवं व्रत पारण (28 अक्टूबर 2025, मंगलवार)

अंतिम दिन प्रातःकाल व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह छठ पर्व का सबसे पवित्र क्षण माना जाता है।
व्रती सूर्य देव से परिवार की समृद्धि, संतान की रक्षा और जीवन में स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
अर्घ्य के बाद व्रत पारण कर 36 घंटे का निर्जला उपवास पूर्ण होता है।
➡️ उषा अर्घ्य नवज्योति और नई ऊर्जा का प्रतीक है।


छठ पूजा का धार्मिक महत्व

छठ पूजा हिंदू धर्म में सूर्य उपासना का सबसे प्राचीन पर्व माना गया है।
पुराणों के अनुसार, छठी मइया सूर्य देव की बहन हैं और वह संतान तथा परिवार की रक्षा करती हैं।

महाभारत काल में भी द्रौपदी और पांडवों ने सूर्य उपासना कर कष्टों से मुक्ति पाई थी। तभी से यह पर्व जनमानस का अंग बन गया। छठ पूजा आत्मशुद्धि, कृतज्ञता और प्रकृति के प्रति सम्मान का उत्सव है।


छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्व

धार्मिक आस्था के साथ-साथ छठ पूजा के पीछे कई वैज्ञानिक कारण भी हैं —

  • सूर्य किरणों से लाभ: सुबह और शाम की सूर्य किरणें शरीर में विटामिन D की पूर्ति करती हैं।
  • शरीर की शुद्धि: 36 घंटे का निर्जला उपवास शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालता है।
  • प्रकृति संरक्षण: नदी और सूर्य की पूजा पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
  • मानसिक अनुशासन: यह व्रत व्यक्ति में संयम, धैर्य और एकाग्रता की भावना उत्पन्न करता है।

छठ पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विज्ञान और जीवनशैली का समन्वय है।


छठ पूजा: आस्था और विज्ञान का अद्भुत संगम

छठ पूजा भारतीय संस्कृति की गहराई और पर्यावरणीय चेतना का जीवंत उदाहरण है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि सूर्य की तरह हमें भी समाज में ऊर्जा, प्रकाश और सकारात्मकता फैलानी चाहिए।

छठ मइया सबके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद दें।



छठ पूजा के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। पूजा सामग्री में प्लास्टिक का प्रयोग न करें और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएँ।

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