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जशपुर: नवरात्रि में मां दुर्गा नहीं, ‘राजा’ महिषासुर की पूजा करता है ये ‘असुर’ समुदाय

जशपुर: नवरात्रि में मां दुर्गा नहीं, ‘राजा’ महिषासुर की पूजा करता है ये ‘असुर’ समुदाय
जशपुर (छत्तीसगढ़)। जहां पूरे देश में शारदीय नवरात्रि पर मां दुर्गा की भक्ति में लोग डूबे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में एक अनोखी परंपरा देखने को मिल रही है। यहां मनौरा विकासखंड के पहाड़ों पर निवास करने वाला एक जनजातीय समुदाय ‘राक्षसराज’ महिषासुर को अपना पूजनीय पूर्वज और राजा मानकर उनकी आराधना करता है। ये समुदाय खुद को महिषासुर का वंशज बताता है।


छल से वध की मान्यता, शोक में मनाते हैं नवरात्रि
यह समुदाय नवरात्रि के दौरान दुर्गा पूजा उत्सव से दूरी बनाए रखता है। उनका मानना है कि महिषासुर का वध छल से किया गया था, जिसमें मां दुर्गा ने देवताओं के साथ मिलकर उनके पूर्वज की हत्या कर दी थी। इसलिए, वे महिषासुर की मृत्यु पर खुशी मनाना असंभव मानते हैं और नवरात्रि के नौ दिन गहरे शोक में डूबे रहते हैं। वे देवी के प्रकोप से अपनी मृत्यु होने के डर से भी उनकी पूजा में शामिल नहीं होते हैं।


खेत-खलिहान में होती है पूजा, जाति प्रमाण पत्र में भी ‘असुर’

  • जनजाति के ये लोग अपने खेत-खलिहान में महिषासुर को अपना आराध्य देव मानकर पूजा करते हैं।
  • जशपुर के जरहापाठ, बुर्जुपाठ, हाडिकोन और दौनापठा जैसे स्थानों पर निवास करने वाले इस समुदाय की आबादी केवल 150 से 200 है।
  • उनकी सांस्कृतिक पहचान इतनी गहरी है कि उनके जाति प्रमाण पत्र में भी उनकी जाति ‘असुर’ लिखी हुई है।
  • यह समुदाय दिवाली के दिन भैंसासुर की भी पूजा करता है।

  • सांस्कृतिक विविधता और पहचान का गौरव
    जशपुर का यह ‘असुर’ समुदाय अपनी इस अनूठी परंपरा पर गर्व महसूस करता है और इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान के रूप में संजोए हुए है। यह घटना न केवल छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है, बल्कि भारत में हर समुदाय की अपनी अलग मान्यताएं और विश्वास होने की बात को भी पुष्ट करती है।
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